कहां से आया देहरादून का ‘मियांवाला’ नाम? क्या मुस्लिम पहचान से जुड़ा है, जानें असल कहानी

उत्तराखंड की धामी सरकार ने देहरादून समेत चार जिलों के 15 स्थानों का नाम बदल दिया है. इसमें से एक है देहरादून में स्थित मियांवाला. बता दें सरकार ने मियांवाला का नाम बदलकर रामजी वाला रख दिया है. जिसके बाद से विवाद छिड़ गया है.

मियांवाला का नाम बदलने के बाद छिड़ा विवाद

धामी सरकार का ये कदम उनकी हिंदूत्व वाली छवि के मुताबिक देखा जा रहा है. लेकिन क्या वाकई में मियांवाला का नाम किसी मुस्लिम से जुड़े होने की कहानी कह रहा था. जानतें है ‘मियांवाला’ शब्द का इतिहास (dehradun miyawala history). वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुसाईं ने मियांवाला के इतिहास को लेकर जानकारी दी है.

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कहां से आया देहरादून का ‘मियांवाला’ नाम?

यह पूरी कहानी हिमाचल प्रदेश की गुलेर रियासत और उत्तराखंड की गढ़वाल और टिहरी रियासतों के पुराने ऐतिहासिक संबंधों से जुड़ी है. दरअसल गुलेर रियासत कभी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में थी, और इसका गहरा संबंध उत्तराखंड की गढ़वाल और टिहरी रियासतों (“गढ़वाल और कुमाऊं का इतिहास”, बद्री दत्त पांडे) से था. इन रियासतों के कई राजाओं के आपसी वैवाहिक और पारिवारिक संबंध थे, जिससे उनके बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी हुआ. गढ़वाल के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजा प्रदीप शाह की ससुराल गुलेर में थी. इसी तरह, टिहरी गढ़वाल के राजा प्रताप शाह की पत्नी भी गुलेर से थी. इन वैवाहिक संबंधों के कारण गुलेरिया समुदाय के कई लोग गढ़वाल और टिहरी में बस गए.

जाति नहीं सम्मानित उपाधि थी ‘मियां’

गुलेरिया लोग जो गुलेर रियासत से आए थे, बड़े सम्मानित राजपूत थे. गढ़वाल और टिहरी के राजाओं ने उन्हें जागीरें दीं, जिनमें देहरादून के पास “मियांवाला” भी शामिल था. “मियां” कोई जाति नहीं थी, बल्कि गुलेरिया लोगों को दी गई एक सम्मानजनक उपाधि थी. वे गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह के शासनकाल में यहां आकर बसे और धीरे-धीरे गढ़वाल-टिहरी समाज में घुलमिल गए. टिहरी की रानी गुलेरिया जी का नाम भी इतिहास में बहुत सम्मान से लिया जाता है. वे प्रताप शाह की पत्नी थीं और उनके निधन के बाद उन्होंने टिहरी रियासत को संभाला.उन्होंने अंग्रेजों की चालों को नाकाम किया और अपने बेटे कीर्ति शाह को राजा बनाने में अहम भूमिका निभाई. वे धार्मिक रूप से भी सक्रिय थीं और उन्होंने बद्रीनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी कराया था.

‘मियां’ शब्द का प्रयोग अक्सर मुस्लिम समुदाय में होता है, लेकिन देहरादून का ‘मियांवाला’ नाम गुलेरिया राजपूतों की उपाधि से जुड़ा हुआ है, न कि किसी धार्मिक पहचान से (“ब्रिटिश गढ़वाल और देहरादून”, आर.सी. उनियाल). समय के साथ, मियांवाला में गुलेरिया लोगों की मौजूदगी कम हो गई और वे अन्य जगहों पर बस गए. गढ़वाल के इतिहास में कई अन्य जागीरें भी दी गई थीं, जैसे कि डूंगा जागीर, जो पुंडीर राजपूतों को दी गई थी. मियांवाला जागीर गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह (1709-1772) द्वारा गुलेरिया राजपूतों को दी गई थी, जिससे यह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बन गई. समय के साथ, ये जागीरें छोटी होती गईं और अब इनके मूल निवासी कहीं और बस गए हैं.

मियांवाला में मस्जिद का इंडीकेशन न होना !

मस्जिद का इंडीकेशन न होना इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति न के बराबर रही होगी. अगर इस क्षेत्र का नाम ‘मियां’ के नाम पर होता, तो संभवतः यहां एक मस्जिद की स्थापना होती. मस्जिदें अक्सर मुस्लिम समुदाय की आस्था और जीवन का अभिन्न हिस्सा होती हैं, लेकिन मियांवाला के संदर्भ में, यह स्पष्ट होता है कि यहां इस किस्म का धार्मिक अभिव्यक्ति का कोई स्थान नहीं था. राजपूतों की जागीर के रूप में मियांवाला के विकास ने इसे एक विशेष पहचान दी है, लेकिन यह पहचान उस समय की राजनीतिक और सामाजिक संरचना से अविभाज्य है. यह संभव है कि गढ़वाल में अन्य धार्मिक समूहों का होना उस समय की राजनीति और समाजिक संरचना के कारण था, जिसे मियांवाला की पहचान से जोड़ा जा सकता है.

मियां नाम कहां से आया ?

“मियां” नाम का मूल हिंदी और उर्दू भाषाओं से जुड़ा हुआ है और यह आमतौर पर मुस्लिम समुदाय में प्रयोग होता है.। यह अरबी शब्द “मियाँ” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है “महाशय” या “श्रीमान” – एक सम्मानसूचक संबोधन. इसका इस्तेमाल अक्सर किसी व्यक्ति के प्रति आदर या सम्मान दिखाने के लिए किया जाता है. भारत और दक्षिण एशिया में, “मियां” को कभी-कभी एक उपनाम या व्यक्तिगत नाम के रूप में भी देखा जाता है। ऐतिहासिक रूप से, यह मुगल काल में भी प्रचलित था, जहाँ इसे रईसों या सम्मानित लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन देहरादून का मियांवाला मुगल काल वाला नाम नहीं है.
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